क्या नए Labour Codes कामगारों के लिए खतरा हैं? 26 नवंबर को पूरे देश में विरोध की लहर

New Labour Codes Protest 2025: भारत में श्रम सुधारों को लेकर कई वर्षों से चर्चा चल रही थी। केंद्र सरकार ने अंततः 21 नवंबर 2025 को चार नए लेबर कोड्स को लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी। इन कोड्स का उद्देश्य 29 पुराने श्रम-कानूनों को एक सरल और आधुनिक ढांचे में बदलना है।
लेकिन इसके साथ-साथ पूरे देश में एक बड़ा विवाद भी शुरू हो गया। दस प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने 26 नवंबर को राष्ट्रव्यापी “New Labour Codes Protest” का ऐलान कर दिया है, जिसे वे सरकार की “एकतरफा, श्रमिक-विरोधी कार्रवाई” बता रही हैं।

यह ब्लॉग आपको बताएगा कि नए लेबर कोड्स क्या हैं, ट्रेड यूनियनों को क्यों आपत्ति है, सरकार क्या कह रही है, और यह पूरा विवाद आगे कहाँ जा सकता है।

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New Labour Codes Protest क्या हैं?

सरकार ने जिन चार कोड्स को लागू किया है, वे हैं:

Code on Wages, 2019

  • देशभर में न्यूनतम वेतन की एकरूपता।
  • समय पर वेतन भुगतान।
  • बोनस, ओवरटाइम आदि के नियम स्पष्ट।

Industrial Relations Code, 2020

  • यूनियन मान्यता, हड़ताल-नियम, छंटनी नीतियों में बदलाव।
  • कंपनियों को 300 कर्मचारियों तक छंटनी/बंद करने में अधिक स्वतंत्रता।

Code on Social Security, 2020

  • EPF, ESI, maternity benefit, पेंशन जैसी योजनाएँ एकजुट।
  • पहली बार गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सोशल सिक्योरिटी की श्रेणी में शामिल किया गया।

Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020

  • कार्य-स्थल सुरक्षा, स्वच्छता और कर्मचारियों की कार्य-शर्तों से संबंधित नियम।
  • महिलाओं को रात की शिफ्ट में काम करने की अनुमति (जरूरी सुरक्षा प्रबंधों के साथ)।
  • सरकार का दावा है कि यह सब श्रमिकों के अधिकार सुधारने और उद्योगों को सरल बनाने (ease of doing business) की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है।

ट्रेड यूनियनें क्यों विरोध कर रही हैं?

देश की 10 प्रमुख ट्रेड यूनियनें -AITUC, INTUC, CITU, HMS आदि -ने सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:

(1) यह कदम एकतरफा और जल्दबाज़ी में उठाया गया: यूनियनों का कहना है कि ये कानून बिना विस्तृत चर्चा और बिना श्रमिक संगठनों की सहमति के लागू किए गए हैं। इसी वजह से यह New Labour Codes Protest बुलाया गया है।

(2) छंटनी और भर्तियों पर कंपनियों को अधिक शक्ति: पहले 100 कर्मचारियों से ज्यादा स्टाफ वाली कंपनियों को छंटनी से पहले सरकार की अनुमति लेनी पड़ती थी। अब यह सीमा 300 तक कर दी गई है। यूनियनों का मानना है कि इससे अचानक छंटनी के मामले बढ़ेंगे।

(3) हड़ताल और यूनियन गतिविधियों पर नियंत्रण

नए नियमों के अनुसार:

  • हड़ताल से पहले 14 दिन का नोटिस जरूरी
  • कुछ उद्योगों में हड़ताल को काफी कठिन बना दिया गया
  • यूनियनों की मान्यता और अधिकार कम किए गए
  • ट्रेड यूनियनों के अनुसार इससे श्रमिक हित कमजोर होंगे।

(4) महिलाओं की रात की शिफ्ट पर सुरक्षा चिंताएँ: हालांकि सरकार इसे महिलाओं के लिए अधिक अवसर बताती है, लेकिन कई यूनियनें सवाल उठाती हैं कि “सुरक्षा सुनिश्चित” करने की जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं है।

(5) गिग वर्कर्स को घोषित लाभ सिर्फ कागज़ी?:  जैसे-  Zomato, Swiggy, Ola, Uber जैसे प्लेटफॉर्म वर्कर्स उनके लिए सोशल सिक्योरिटी फंड की घोषणाएँ हैं, लेकिन उसका बजट, नियम और वास्तविक लाभ अभी स्पष्ट नहीं।

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Labour Codes Protest: सरकार की तरफ से क्या कहा जा रहा है?

सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि:

(1) 29 पुराने श्रम कानून अब अप्रासंगिक और जटिल हो चुके थे। नए कोड्स से भारत में श्रम क्षेत्र एक आधुनिक ढांचा पाएगा।

(2) सभी श्रमिकों को न्यूनतम वेतन: पहले असंगठित क्षेत्र में कई लोग इसका लाभ नहीं पाते थे।

(3) Ease of Doing Business बढ़ेगा: सरकार का कहना है कि इससे निवेश बढ़ेगा, उद्योग मजबूत होंगे और नई नौकरियाँ पैदा होंगी।

(4) गिग वर्कर्स को इतिहास में पहली बार सुरक्षा ढांचा: यह सरकार की बड़ी उपलब्धि बताई जा रही है।

(5) महिलाओं के लिए नए अवसर: सुरक्षा प्रावधानों के साथ महिलाएँ रात में भी काम कर सकेंगी -यह “gender equality” की दिशा में कदम बताया गया है।

26 नवंबर का Nationwide New Labour Codes Protest

ट्रेड यूनियनों ने इस दिन-

  • रैली
  • मार्च
  • धरना
  • ज्ञापन-सौंपना
  • श्रमिक सभाएँ

आयोजित करने का निर्णय लिया है। इस Labour Codes Protest में शामिल होने वाली यूनियनों में देश के सबसे बड़े संगठन शामिल हैं, जिनकी सदस्यता लाखों नहीं, करोड़ों श्रमिकों में है। किसान संगठनों और छात्र यूनियनों का भी समर्थन मिल सकता है।

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इस विवाद का असर क्या हो सकता है?

उद्योग जगत में असमंजस: कई कंपनियाँ अभी भी राज्य सरकारों के नियमों का इंतजार कर रही हैं, क्योंकि लेबर Concurrent List में आता है।

श्रमिक संगठनों का आंदोलन लंबा चल सकता है: यदि सरकार पिछे नहीं हटती, तो आगे हड़ताल, बंद और बड़े प्रदर्शनों की आशंका है।

राज्यों पर दबाव: कई राज्य राजनीतिक और आर्थिक कारणों से अलग-अलग रुख ले सकते हैं, जिससे लागू करने में असमानता आ सकती है।

गिग वर्कर सामाजिक सुरक्षा पर विशेष नजर: देखना होगा कि इन कोड्स से उन्हें वास्तविक लाभ मिलता है या नहीं।

विशेषज्ञों का मानना क्या है?

  • सुधारों की दिशा सही हो सकती है, लेकिन क्रियान्वयन की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।
  • श्रमिकों का भरोसा तभी बढ़ेगा जब सरकार सुरक्षा-उपायों और रोजगार-स्थिरता को प्राथमिकता देगी।
  • यूनियनों का विरोध केवल “राजनीतिक” नहीं बल्कि “नीतिगत चिंताओं” से भी प्रेरित दिखता है।
  • आने वाले कुछ महीने भारतीय श्रम-बाजार की दिशा तय करेंगे।
निष्कर्ष

नई Labour Codes Protest को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सरकार बनाम ट्रेड यूनियनों का बड़ा मुद्दा बन चुका है। सरकार इन्हें 21वीं सदी के श्रम सुधार बताती है, जबकि यूनियनें इसे “श्रमिकों के साथ धोखा” कह रही हैं। New Labour Codes Protest के चलते यह आंदोलन कितना बड़ा रूप लेगा और सरकार का रुख क्या होगा -यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि नए लेबर कोड्स भारत की श्रम नीतियों को पूरी तरह बदलने वाले हैं, और इनका प्रभाव आने वाले वर्षों तक देश के रोजगार-बाजार पर दिखाई देगा। आपको यह आर्टिकल कैसा लगा आप हमें कमेंट करके जरुर बताईये, मिलते है अगले ब्लॉग में।

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