Daylight Saving Time 2025: क्यों बदले जाते हैं घड़ियों के समय, अमेरिका-कनाडा में हुआ बड़ा बदलाव!

हर साल नवंबर और मार्च में दुनिया के कई देशों में घड़ियों का समय बदलना एक आम प्रक्रिया है, जिसे Daylight Saving Time यानी डेलाइट सेविंग टाइम कहा जाता है। इस बार, 2 नवंबर 2025 को अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में रात 2 बजे घड़ियां एक घंटा पीछे की गईं और इस तरह ‘फॉल बैक’ प्रक्रिया के साथ Daylight Saving Time का अंत हुआ। अब इन देशों में स्टैंडर्ड टाइम लागू हो गया है।

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Daylight Saving Time (DST) क्या है?

डेलाइट सेविंग टाइम (DST) एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें गर्मियों के दौरान घड़ियों को एक घंटा आगे बढ़ाया जाता है, ताकि दिन की प्राकृतिक रौशनी का अधिक उपयोग किया जा सके। इसका मुख्य उद्देश्य है शाम को अधिक समय तक धूप मिले और बिजली की खपत कम हो। आमतौर पर मार्च-अप्रैल में DST लागू होती है, जिससे सुबह की रोशनी कार्य समय के लिए बच जाती है और शामें लंबी हो जाती हैं। यह प्रणाली अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कई देशों में अपनाई जाती है, ताकि ऊर्जा की बचत की जा सके और नागरिकों को अधिक गतिविधि के लिए समय मिल सके। India में यह लागू नहीं होती।

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घड़ियां कब और क्यों बदलनी पड़ती हैं?

मार्च में Daylight Saving Time के तहत घड़ियां एक घंटा आगे की जाती हैं, जिसे ‘Spring Forward’ कहा जाता है। इसका उद्देश्य दिन की रौशनी का पूरा लाभ लेना है। वहीं नवंबर आते ही, सर्दी की शुरुआत के समय, घड़ियां एक घंटा पीछे कर दी जाती हैं, जिसे ‘Fall Back’ कहते हैं। इस बदलाव से सुबह और शाम के समय की रौशनी मौसम के अनुसार सही तरीके से उपयोग की जाती है। ज्यादातर अमेरिका, कनाडा एवं यूरोप के कुछ देशों में यह प्रणाली अपनाई जाती है ताकि ऊर्जा की बचत हो और लोगों के कार्य व दैनिक जीवन में सुविधा बनी रहे।

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इस साल का बड़ा अपडेट

इस वर्ष का खास अपडेट यह है कि 2 नवंबर 2025 को अमेरिका और कनाडा में Daylight Saving Time (DST) खत्म हो गया है। अब वहां स्टैंडर्ड टाइम लागू हो गया है, जिससे शामें पहले की अपेक्षा जल्दी अंधेरी होंगी और लोगों को एक अतिरिक्त घंटा आराम मिलेगा। यह बदलाव ऊर्जा बचत और जीवनशैली के लिए अहम माना जाता है। अगला बदलाव मार्च 2026 में होगा, जब घड़ियों को फिर एक घंटा आगे किया जाएगा। इस दौरान रातें छोटी और दिन लंबे महसूस होंगे, जिससे शाम की रोशनी का ज्यादा लाभ मिल सकेगा।

भारत में क्या असर?

भारत में Daylight Saving Time (DST) लागू नहीं होता, क्योंकि यहाँ साल भर दिन और रात लगभग समान रहते हैं। भारत भूमध्य रेखा के निकट स्थित है, जिससे सूर्योदय और सूर्यास्त का समय विशेष रूप से नहीं बदलता, चाहे मौसम कोई भी हो। इसी वजह से भारतीय नागरिकों को घड़ियों का समय बदलने की जरूरत नहीं पड़ती है। अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कुछ देशों में जहाँ दिन-रात की अवधि अलग-अलग होती है, वहाँ DST का पालन किया जाता है। भारत में समय की एकरूपता बनी रहती है और कोई अतिरिक्त या घटा हुआ घंटा नहीं जोड़ा जाता।

कब और कैसे शुरू हुई ये परंपरा?

Daylight Saving Time (DST) की परंपरा की शुरुआत 18वीं सदी में Benjamin Franklin के एक विचार से हुई थी, जिसमें प्राकृतिक रोशनी का अधिक उपयोग करने की बात कही गई थी। हालांकि, इसका औपचारिक और व्यापक इस्तेमाल प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऊर्जा बचत के लिए शुरू हुआ। बाद में, दूसरे विश्व युद्ध में भी इसका उपयोग किया गया। आज के समय में अमेरिका, कनाडा, यूरोप के कई देशों सहित दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में इस प्रणाली का पालन किया जाता है, ताकि बिजली की बचत की जा सके और नागरिकों को अधिक रोज़मर्रा गतिविधियों का समय मिल सके।

निष्कर्ष:

डेलाइट सेविंग टाइम एक उपयोगी व्यवस्था है जिससे प्राकृतिक रोशनी का पूरा लाभ उठाया जाता है और बिजली की बचत की जाती है। अमेरिका और कनाडा ने इस वर्ष भी इस प्रणाली के अनुसार घड़ियों का समय पीछे किया, जिससे शामें जल्दी अंधेरी होंगी और लोगों को अतिरिक्त आराम मिलेगा। अगले कुछ महीनों तक यही टाइम-टेबल लागू रहेगा, और फिर मार्च में घड़ियां फिर आगे की जाएंगी।

डिस्क्लेमर:

Daylight Saving Time समाचार केवल शैक्षिक और जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स एवं आधिकारिक समय सारणी पर आधारित है। देश-दुनिया की ऐसी रोचक खबरों के लिए  आप हमारे साथ जुड़े रहें!

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